Follow by Email

Tuesday, April 3, 2012

"फरहद"


तीन साल पहले मेरे पास शादी का एक कार्ड आया था. कश्मीर से. मेरी कोई रिश्तेदारी भी नही थी. दो  बार ही जाना हुआ था वहां. मैं किसी सबीना को नही जानता था.(कार्ड पर यही नाम लिखा था.) कार्ड खोलकर देखा, दिमाग पर जोर डाला तो कार्ड में लिखा एक नाम "फरहद" पर आँखें अटक गयी. एक पूरा मंजर मेरी आँखों के सामने घूम गया.  


मैंने बहुत देर तक इंतजार करने के बाद आखिर एक ट्रक को हाथ दे ही दिया.. उस सड़क पर किसी और के रूकने की उम्मीद अब खत्म हो चुकी थी. लगभग एक घंटा मुझे वहां हाई वे पर खड़े खड़े हो चुका था. पर ट्रक भी नहीं रुका. कई बार आपकी अपनी आशाओं और अपेक्षाओं को टूटते हुए देखकर भी आपको दुःख नहीं होता. खीझ नहीं होती. बस एक समता के साथ आप उसे स्वीकार करते हैं. यही हो रहा था. मैं पूरी सात्विकता के साथ उस क्षण को जी रहा था. 

यात्रा एक ऐसे पड़ाव पर थी. जहाँ केवल स्थितियों के अनुसार आप चल सकते थे. उन पर नियंत्रण संभव कहाँ था. मैं अपने ही विचारों की ज़मीन पर खड़ा था. पीछे से आ रही आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी.
 एक ट्रक मेरे ठीक पीछे था मैंने हाथ दिया.ट्रक की रफ़्तार कम हुई और मेरी तेज़. लेकिन कोई फायदा नहीं. ट्रक की रफ़्तार फिर से तेज़ हो गयी और मेरी कम. मैं सिर्फ मुस्कुरा सका. थोड़े और इंतजार के बाद मैंने धीरे धीरे चलना शुरू कर दिया था की अपने ही बूते पर थोडा फासला तय कर सकूं.  मैंने चलना शुरू ही किया था कि पीछे से एक और ट्रक आता दिखाई पड़ा. इस बार मैं हिम्मत करके सड़क के लगभग बीच में आ गया था. फिर हाथ दिया. ट्रक मुझसे पहले ही रुक गया था. मैंने  खिड़की के पास जाकर कहा "जम्मू". ड्राइवर ने खिड़की से सर बहार निकल कर कहा - आ जाओ
मैंने कोई देरी नही की.
 दूसरी तरफ से घूमकर फुर्ती से ट्रक के अंदर. मुझे हमेशा ही ट्रक वालो की एक आदत अच्छी लगती है कि ट्रक को एकदम सजा धजा कर रखते हैं. सामने २ कठपुतलियां तंगी थी. २ पोस्टर्स चिपके थे. सामने के शीशे के तीन तरफ हरी पत्तियों वाली  प्लास्टिक कि बेल लगी थी. मैंने अपना बैग अपनी गोद में रख लिया. पहली बार ड्राइवर को देखा - २३ - २४ साल का नया लड़का. गोरा और थोडा सा पहाड़ी सा दिखने वाला. बोला - मैं रस्ते में खड़ी सवारी को कभी मना नही करता बैठने के लिए. मेरे अब्बा कहा करते थे कि मुसाफिरों को उनकी मंजिल तक पहुचने से बहुत पुण्य मिलता है. (इस से यह तो पता चल गया कि अब्बा अब नही थे)
उसने ये बाते बड़े ही सूफियाना अंदाज़ में की थी. मैंने एक बार फिर से ट्रक का सरसरी निगाह से जायजा लिया.
ड्राइवर की सीट के पीछे सोने के लिए जगह थी. जिस पर कोई सोया हुआ था. मैंने पीछे मुड़कर उसे गौर से देखा- तो ड्राइवर ने कहा की "मुनीर है - मेरा साथी - मेरा हमसफ़र".
हमने लगभग १५ किलोमीटर का सफ़र तय किया होगा. ड्राइवर ने सड़क के किनारे लगाकर ट्रक रोक दिया. अपने साथी को उठाया. नीचे कूदा. जोर से बोला आप भी नीचे आ जाओ जरा रुक कर चलेंगे. मैं बाहर आ गया. हवा ठंडी थी. दूर पहाड़ों पर बर्फ अभी भी चमक रही थी. मुनीर नीचे उतर आया. बोतल के पीनी से मुंह धोया. फिर ट्रक से एक चटाई निकल कर बाहर बिछा दी.
मैं चटाई पर जा बैठा. थोड़ी देर में ड्राइवर भी. जोर से बोला - "मुनीर खिचड़ी बना ले " - आप खिचड़ी खाओगे? दोनों ही बाते मेरे लिए अटपटी थी. ट्रक वालों को ढाबों पर खाते देखा था. लेकिन खाना बनाने की बात??????
 वो मेरे चेहरे को देखकर समझ गया शायद. "हम अपना खाना खुद बनाते हैं.  मुनीर के हाथों में जो स्वाद है उसकी बात ही कुछ और है"
मैंने खाने के लिए हामी भर दी.
नाम फरहद. श्रीनगर के पास एक छोटे से गाँव में घर. पिताजी छः साल पहले ट्रक की एक दुर्घटना में नही रहे. माँ के लाख मरने के बाद भी सत्रह साल की उम्र में ट्रक चलाना शुरू कर दिया. बारहवीं के बाद पढाई छोड़ दी. हालाँकि मन बहुत था पढने का.  पर घर का इकलौता लड़का. घर के लिए कमाएगा नहीं तो लोग क्या कहेंगे.
फ़ौज में जाने के मन था. बचपन से बंदूके बहुत पसंद थी. लेकिन घाटी में इतनी बंदूके देखीं की अब तो .............
मैंने अपना सपना बदल लिया है. लों लेकर ये अपना ट्रक खरीदा है. पहले फ़ौज में जाने का  सपना था अब एक ही सपना है कि अपनी दोनों छोटी बहनों का ब्याह अच्छे घर में करून. . जो काम अब्बा नही कर पाए उन्हें मैं करूंगा. मैं उसकी पाक आँखों को देख रहा था. जो गीली जरूर हओ गयी थी लेकिन बरसी नहीं. मैं ज्यादा देर तक उसकी आँखों को नही देख पाया. कितना मुश्किल होता होगा. मन के करीब के किसी सपने को मारना और अपने ही हाथों दफ़न कर देना.
मुनीर ने ट्रक से स्टोव उतरा. फिर एक एक करके बर्तन और बहुत कुछ. खिचड़ी बनी. साथ में कोई नई किस्म का अचार और एक मीठी चटनी भी. (फरहद ने बताया की सब कुछ उसकी छोटी बहन सबीना ने बनाया था.) गलत नही कहा था फरहद ने - "मुनीर के हाथों की बात ही कुछ और है" यह खिचड़ी किसी भी होटल  और ढाबे से कहीं ज्यादा अच्छी और बेहतर. उसके बाद मुनीर पहाड़ी गाने सुनाता रहा. और फिर बांसुरी पर पहाड़ी धुनें. मुनीर बिलकुल किसी फिल्म के सहायक अभिनेता की तरह था. जिसके बिना बहुत कुछ अधूरा रह जाता. आकाश में हलके धुंधले बदल उठ खड़े हुए थे.  हम तीनो लगभग २ घंटे बाहर बैठे रहे. अब मुझे जम्मू पहुँचने की जल्दी नही थी.
उस दिन मुझे लगा की कोई भी सफ़र मंजिल से ज्यादा खूबसूरत कैसे हो सकता है...
शादी का वो कार्ड आज भी फरहद के सपने के पूरा होने का सबसे बड़ा गवाह है..........................................

6 comments:

  1. भारत की सरहदों पर ऐसे बहुत से फरहद आज भी भटक रहे हैं. फर्क यह है की कुछ दूसरों की राह आसान करने में लगे हैं और कुछ राहों को बारूदी सुरंग से उड़ाने में मशगूल हैं...

    ReplyDelete
  2. just wow...super duper like..

    padhne ke baad lagta hai ki jaldi khatam hogaya...thora aur hona chaiya..

    ReplyDelete
  3. 'A Journey more Beautiful than the destination itself.'

    Beautiful post and very sensitive writing bro.
    "मैंने अपना सपना बदल लिया है." WoW...I sometimes wonder how many veils a simple statement wears before getting expressed...

    "Kitne labade usne odhe honge mera deedar karne se pehle..."

    Lalit Kishore

    ReplyDelete
  4. As always..it is also amazing...touched the soul and give a sensation to heart..Tell you..this can only be with you..nobody else has that trait what you have..and if somebody..then i never met in my life..and believe that I will not..

    उस दिन मुझे लगा की कोई भी सफ़र मंजिल से ज्यादा खूबसूरत कैसे हो सकता है...

    ReplyDelete
  5. न जाने क्यों हर इंसान की लगता है कि वो ही दुनिया में सबसे अधिक व्यस्त है और दुखी है. लेकिन जब कोई और अपनी कहानी बया करता है तो अपना दुःख कम प्रतीत होता है. फरहद की कहानी ज़िन्दगी के सपने और हकीकत को बया करती है. फिर भी वो मज़बूत है, अपने लक्ष्य साधने में लगा है. आपका प्रकति से प्रेम और अपनत्व कहानी को चार चाँद लगता है. खुश रहिये.....:)

    ReplyDelete