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Wednesday, January 23, 2013

माकेदातु

यह एक खूबसूरत सुबह थी। सूरज पूरी तरह से जमीन को अपने आगोश में लेता उस से पहले ही हम बैंगलोर शहर से बाहर निकल चुके थे। हलके हलके सफ़ेद बादल रुई के ढेर से इधर उधर उड़ रहे थे। उनके कोने सूर्य रश्मियों के स्पर्श के साथ चमक रहे थे। बड़े नीले आसमानी  मैदान  में कुलांचे भरते हुए उन्मुक्त बादल। बादलों के बीच कही मैं भी, मंजिल से अंजान सफ़र का आनन्द लेता रहा।

मेकेदातु।  बहुत सारे लोगों से पूछने के बाद कि बंगलोर के पास कौन सी जगह देखने लायक है। मैंने मेकेदातु को चुना था। पता केवल इतना चल पाया कि  कावेरी नदी  पर एक जल प्रपात है। कनकपुर की तरफ। एक टैक्सी ली, सुबह साढ़े 6 बजे बंगलौर से निकले ड्राइवर ने बताया की लगभग 100 किलोमीटर जाना है।
पहले कभी गये हो?
एक बार सर। कई साल पहले।
कैसी जगह है?
पता नही?
क्यों?
गाडी पहले ही रोकनी पड़ती है फिर नदी पार कर के उस पार जाना होता है झरना देखने के लिए। 

मेरी ड्राइवर के साथ यह पहली बातचीत थी। लेकिन उसके आख़िरी जवाब ने मेरा रोमांच और बढ़ा  दिया था। अकेले जाने से कई लोगों ने मना किया था क्योंकि जगह अनजान सी थी और हिंदी बोलने वाले भी कम लोग ही मिलते हैं। लेकिन एक नए स्थान को देखने का लोभ मुझे हमेशा आगे बढ़ने को प्रेरित करता रहा है। आज भी यही हुआ। 
बंगलोर शहर से बहार निकल कर मटमैले, हरे, पीले खेत दिखने लगे। खेतों में काम करते हुए लोग। छोटे छोटे गाँव। सड़कों पर आवाजाही बढ़ चुकी थी। मैं उस भारत को देख रहा था जो वास्तविक भारत है। एक सुकून देने वाली शांति से भरा पूरा माहौल। भारत के किसी भी कोने में चले जाओ, यह शांति अच्छी ही लगती थी।

रस्ते में एक कस्बे  ने हमने कोंफी पी, साथ में कुछ नमकीन भी। एक स्थानीय स्वाद। शानदार। 
रास्ते में धूप  तेज हो रही थी और हवा सुहानी। नारियल के पेड़ साथ साथ चल रहे थे। मैं कब सोया पता ही नहीं चला।
आँख खुली तो गाड़ी एक नाके पर खड़ी थी। ड्राइवर ने थोडा आगे जाकर गाड़ी खड़ी  कर दी। बोला कि आगे आपको पैदल जाना होगा। मैं हतप्रभ सा था। समझ में नही आया क्या करू। कंधे पर बैग डाला और चल पड़ा। 
कोई आधा फर्लांग चलने के बाद एक सरकारी रेस्ट हाउस था। उसके एक चौकीदार ने टूटी फूटी हिंदी में पहले बताने की कोशिश की और जब मेरी समझ में नहीं आया तो इशारा करके समझाया। पहले से ही ड्राइवर ने मुझे बताया था की नदी पार करके जाना पड़ेगा।

रेस्ट हाउस से पीछे की तरफ निकल देखा तो मैं कुछ देर सम्मोहन में खड़ा रहा। कावेरी और अर्कावती नदी का संगम। शांत जलराशि। कावेरी नीलापन लिए और अरकावती एक सदा सा पनियालापन लिए हुए। पत्थरों से टकराती लहरें। मानो अस्तित्व की लड़ाई चल रही हो। एक द्वन्द बहने और रुकने के दर्शन के बीच। 
 मैं खुश था कि बरमूडा पहन कर आया था। जूते उतर कर हाथ में लिए और अरकावती में उतर गया। दो धराये बह रही थी। पहली में घुटनों से ऊपर तक पानी और दूरी में उस से कुछ ज्यादा। उस पार एक बस खड़ी दिखी। नीचे फिसलने वाले पत्थर। संभलते हुए उस पार पहुंचा। सामने जंगल था। वही एक बड़ी बस कड़ी थी। पुरानी सी। ड्राइवर ने कहा की साढ़े 10 बजे चलेंगे। शायद तब तक कोई और भी आ जाए।

अगर कोई और नही आया तो?
अकेले आपको लेकर चलूँगा।
अकेले??? मैं इतनी बड़ी बस में।
कितनी दूर जाना है?
चार किलोमीटर।
कई बार अकेलापन आपको कचोटता नही है बल्कि आपको हिम्मत देता है। मैं सुबह जिस रोमांच की आशा के साथ साथ निकला था यह  उसका चरम था। की एक बड़े जलप्रपात को देखने मैं बिकुल अकेले जाने वाला था। बिलकुल अकेले। जिस जगह के बारे में मैं बस इतना और जानता था कि वहां बहुत कम लोग जाते हैं।


मैं बस के चलने तक कुछ फोटो खींचता रहा। और निगाहें नदी के उस पार उस रेस्ट हाउस की तरफ थी कि शायद कोई और आ जाये। लेकिन नदी अपनी गति से बहती रही उसे किसी ने परेशां नही किया।
ठीक साढे  10 बजे बस का भोंपू बजा। मेरा ध्यान उस तरफ गया तो ड्राइवर इशारे से बुला रहा था। मैं वहां पहुंचा बस में चढ़ा तो पूरी बस खाली थी। मैं ड्राइवर के बगल में जा बैठा। 

ऊंचा नीचा रास्ता , जंगल के बीच से और ड्राइवर बिना किसी परवाह के तेज रफ़्तार से मंजिल की ओर  बढ़ 
चला।
कहीं कहीं पर कावेरी का विस्तार दीखता है। लेकिन थोड़ी देर बाद कावेरी नहीं दिखती बल्कि केवल चट्टानें दिखती हैं। हम उपर चढ़ते जा रहे थे। काफी मुश्किल रास्ता था। चट्टानें बढती जा रही थी। आगे कुछ नहीं दीखता। 
अचानक तेज ब्रेक। 
मैं नीचे उतरा। वहां से कुछ नहीं दीखता। ड्राइवर ने इशारे से बताया - नीचे उतर जाओ। मुझे अभी भी कावेरी नहीं दिखी थी। मैं संभल कर नीचे उतर गया, कोई 100 फीट नीचे उतरने के बाद चट्टानों के बीच से रास्ता दिखा। मैं एक पल के लिए ठिठका। फिर चल पड़ा। 
मैंने मुश्किल से पचास कदम चला था की मैने पानी की आवाज सुनी। मेरे कदम तेज हो गए। थोडा आगे जाकर मैं एक बड़ी चट्टान पर चढ़ गया। उस चट्टान से आखिरी छोर से नीचे देखा। कावेरी लगभग 100 फुट नीचे चट्टानों के बीच बह रही थी। यहाँ कावेरी का विस्तार 10 मीटर से ज्याद नहीं है। 

मैं एक पल सहम गया। नीचे दोबारा देखने की हिम्मत नही थी। मैं समझ नही पाया की मेरी सांसो की गति ज्यादा तेज़ थी या कावेरी का वेग ज्यादा था। लेकिन जल प्रपात कहाँ है? नही दिखा। किस से पूछूं? पंछी तक नहीं था। 
मैंने उपर बस की तरफ देखा, चट्टानों के अलावा कुछ नही दिखा। मानों मैं चट्टानों के नगर के बीच दम साधे खड़ा था। चट्टानों की तरह तटस्थ और अचल। समझ में नहीं आया कि क्या करून। झरना तो देखना है। पर है कहाँ?

एक पल को लगा कि  अकेले आने का निर्णय गलत था शायद। मैंने बायीं तरफ जाकर नीचे देखने का निर्णय लिया। मैं चट्टान पर चढ़ा और ज्यों ही दाहिनी तरफ चला, पैर अचानक ठिठक गए। ये क्या है? कुआं?
पूरी चट्टान में किसी ने खोद कर कुआं  बनाया हो जैसे। मैं प्रक्रति के इस अजूबे को देखकर हैरान था। मैं नीचे कावेरी को बहते देख रहा था। 

मैं वापस लौट पड़ा। मुझे प्रपात नही देखना। बस वापस जाना है।
मैं वापस मुडा  ही था कि  किसी के पैरों की आवाज़। कोई भरम।। नहीं कोई सच में था। मेरी ही तरफ आता हुआ। एक नहीं दो। मेरी बस का ड्राइवर भी साथ में था। 
उसके साथ कोई और था। अधेड़ उम्र। मेरे पास आकर हाथ मिलाया। अपना परिचय दिया। सरकारी मास्टर। पास के गाँव के  वाले और उसी गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हैं। धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल रहे थे। मैंने अपना नाम बताया और बताया कि मैं दिल्ली से आया हूँ। 
उन्होंने एक अपेक्षित सा सवाल पुछा - यहाँ कैसे? मैंने कुछ नही बोल पाया क्योंकि मेरे पास कोई वाजिब जवाब नही था। इतना कहना काफी नही था कि  मैं बस जिज्ञासावश चला आया। मैं बस मुस्कुरा दिया।
मैंने वही सवाल उनसे पूछा - वो भी मुस्कुरा दिया। 
मैंने  उनसे कहा  की मुझे प्रपात देखना है जो नहीं दिखा। हम वापस  उस बड़ी चट्टान पर गये। जहाँ मैं पहले गया था। नीचे झुककर बाई तरफ देखा।  एक बार फिर से मेरी सांसे थम गयी, अथाह जलराशि एक साथ नीचे गिर रही थी। मुह से "आह" निकला। मैं उस दृश्य को आँखों में हमेशा के लिए बंद कर लेना चाहता था। काश यह हो पाता।

मैं बहुत शांत था। पीछे आकर हम वहीँ बैठ गए। उनहोंने अपने थैले से मूडी ( हम उत्तर भारत में उसे परवल कहते हैं ) निकाली। मुझे भी दी। 
उस के बाद उन्होंने जो भी बताया वो मेरे लिए एक प्रेरणा से कम नही था।
बचपन में पिताजी के साथ यहाँ पहली बार आया था। उसके बाद तो अपनी तीन गायों को लेकर मैं अक्सर इस तरफ आ जाता। घंटों यहाँ बैठा रहता। बड़े होने पर भी यहाँ आना नहीं छूटा। शादी के बाद अक्सर अपनी पत्नी के साथ यहाँ आता था। दो साल पहले वो नहीं रही। तो भी यहाँ आना नहीं छूटता। यहाँ का एक एक पत्थर मुझे जनता है जैसे। मुझसे बतियाता है। पता नही क्यों मुझे कावेरी की इस आवाज से कोई लगाव सा हो गया। यहाँ बैठता हूँ तो लगता है जैसे पानी के शोर से भी कोई धुन उठती हो। वो धुन मेरे भीतर बजती है।

मैं उन्हें अपलक देख रहा था। जो जगह  मुझे पहले डरावनी और बियाबान लगी थी। वो जगह किसी के लिए इतनी खूबसूरत भी हो सकती है। मैं भी वहां उनके साथ तब तक रहा जब तक तीसरी बार ड्राइवर ने आकर यहाँ नही कहा की अब चलना ही होगा। तब तक उन्होंने मुझे वहां की एक एक जगह को अच्छे से दिखाया उन्होंने बताया की मेकेदातु का अर्थ है बकरी की छलांग। एक पौराणिक कथा भी सुनाई  - जो मुझे पूरी समझ में नहीं आई। लेकिन मैं देख रहा था कि उस स्थान के लिए इस व्यक्ति के मन में कितनी  तन्मयता  और कितनी श्रधा है।
मैं उपर वापस आ गया। बस तैयार खड़ी थी। मैंने नीचे देखा तो चट्टानों के नगर मनो उपर उठ रहा था। बस वापस लौट चली। 
मैं अरकावती और कावेरी के संगम पर  बहुत देर तक बैठा रहा। वो स्थान मानो मेरे सामने खड़ा था। मेकेदातु के उस प्रवाह को मैं अब भी महसूस कर सकतअ हूँ

Wednesday, October 10, 2012

चाय वाला



 मेरे लिए यह सफ़र कुछ नया सा था. कुछ अलग सा भी था. दोपहर के एक बजे हम थेनी पहुचे थे. दिल्ली से हवाई जहाज से चेन्नई. चेन्नई से ट्रेन से मदुरै और फिर मदुरै से बस से थेनी. लगातार सफ़र से थोड़ी थकान हो गयी थी. लेकिन मदुरै से थेनी के खूबसूरत रास्ते ने थकान को बाहर नही आने दिया. बस में कोई तमिल फिल्म चल रही थी. मुझे एक शब्द भी नहीं समझ में आया था. पर स्थानीय यात्रियों के चेहरों के हाव भाव ने मुझे उस फिल्म को देखते रहने को मजबूर कर दिया. कमल हासन की फिल्म. 


मैं बाहर के खूबसूरत नजारों और फिल्म के बीच झूलता रहा था रास्ते भर. तमिलनाडु और केरल की सीमा पर बसा यह स्थान दक्षिण भारत की सही तस्वीर दिखा रहा था. सब कुछ इतना हरा भरा था कि  मन की तहों के बीच छिपाने का मन हुआ.
दिल्ली से चला तो थेनी कैसा होगा यह सोचकर  बस कुछ कल्पनाओं के चित्र खींच पाया था. पर असलियत के चित्र  मेरी कल्पना से कहीं परे थे. कहीं जयादा सुंदर, कहीं ज्यादा खूबसूरत और निश्छल. 
थेनी के एक गुरुकुल में मुझे तीन दिन रुकना था. इस गुरुकुल में वेदों का अध्ययन किया जाता है. शांत और सौम्य. पहाड़ की तलहटी में बसा. गुरुकुल के बीच से बहती हुई शांत नदी. थोड़ी सी इर्ष्या हुई थी मुझे वहां पढने वालों और रहने वालों के प्रति. मन हुआ कि फिर से पढना शुरू कर दूँ. प्रकृति के साथ साथ वहां रहने वाले बालकों के चेहरे भी कितनी समता से भरे थे. 
सूरज नीचे गिरने लगा था मानों को नीचे की और खींच रहा हो उसे. पानी का रंग बदलने लगा. पिघले हुए सोने की नदी. नदी एक मोड़ के साथ गुरुकुल की सीमा में प्रवेश करती थी. मैं वहां बैठा बहुत देर तक नदी और पहाड़ों के बदलते हुए रंगों को देखता रहा था.

शाम होने लगी तो थकान बाहर आने लगी. मैं अकेला ही बाजार की ओर निकलना चाहता था पर मैं जानता था कि भाषा के कारण दिक्कत होगी.  इसलिए अपने साथ तमिल बोलने वाले साथी को साथ ले लिया. उत्तर भारत से बिलकुल उलट. यह शहर साफ सुथरा था. शोर ओर भीड़ भाड़ भी उतनी नहीं थी. घरों के बहार रंगोली बनी है, कई  चौखटों पर दीये रखे थे. कुछ दरवाजों पर छोटी लड़कियां दिए जला रही थी. 
आप कितना भी चाहें संस्कृति कि यह दिव्य आभा मन को छुए बिना नही रहती. 
बात करते करते हम बस स्टैंड पहुच गए.

चाय पीने का मन था. बस स्टैंड पर एक छोटी सी दुकान. पर चाय पीने वालों कि संख्या को देखकर लगा कि शायद चाय अच्छी होगी इसलिए इतनी भीड़ लगी है. कुछ देर इंतजार के बाद चाय मिली. मैं तब तक टाट के आसन पर बैठे उस बुजुर्ग व्यक्ति के चाय बनाने के तरीको को देखता रहा. एक अलग ही तरीका. कोई साठ के आसपास उम्र होगी. लेकिन हाथ गजब कि तेजी से चल रहे थे. शानदार स्वाद. कुछ अलग लेकिन बहुत बेहतर. मैं तीन कुल्हड़ चाय पी गया . मन नही भरा था. लेकिन..
अगले दिन मैं दो किलोमीटर चल चल कर तीन बार चाय पीने गया. (दो बार अकेले) शाम तक वो मुझे पहचानने लगे थे. मेरे साथी ने उन्हें बता दिया कि हम लोग दिल्ली से आये हैं.

थेनी में उन दो दिनों में मैं ज्यादातर समय या तो नदी के किनारे था या चाय की दुकान पर. नदी के पास बैठकर आप न भी चाहो तो स्वयं में खोये बिना, स्वयं से बतियाये बिना आप रह ही नहीं सकते. प्राचीन गुरुकुलों की शानदार परम्पराओं का भास अपने आप होता है.

चाय की दुकान पर बैठकर पूरे उस चाय की दुकान के मालिक को पूरे दिन पूरी ऊर्जा और निष्ठां के साथ काम करते हुए देखकर जीवन के प्रति सम्मान बढ़ता है. लगता है -  हमारे कार्यक्षेत्र से अंतर नहीं पड़ता, कार्य के प्रति हमारे समर्पण से अंतर पड़ता है.
गुरुकुल में तीसरा और आखिरी दिन. रात को वापस मदुरै के लिए निकलना था. शाम के लगभग चार बजे थे. मैंने सोचा कि एक बार और चाय पी जाये. क्या पता फिर कभी यहाँ आना हो या ना हो. 
आज अपेक्षाकृत भीड़ कम थी. बातचीत का अवसर मिल गया. 

चाय की दुकान को बयालीस साल हो गए. मैं सत्रह साल का था जब मैंने ये चाय कि दुकान शुरू की थी. पिताजी और बाकि लोगों के विरोध के बावजूद. पिताजी चाहते थे कि मैं उन के साथ दूसरों खेतों पर काम करने जाऊ. मुझे पसंद नही था. इसलिए मजदूरी के इकठ्ठे हुए पैसों से मैंने यहाँ सड़क के किनारे चाय बनानी शुरू की. बाद में यहाँ बस स्टैंड बन गया. साल का कोई एक दिन मेरे लिए त्यौहार नही होता. हर दिन त्यौहार होता है. बरसात, गर्मी, सर्दी कुछ भी हो. अगर एक भी दिन चाय नही बनाता तो लगता है कई लोगों का दिन शुरू नही हुआ होगा. 

मैं जानता हूँ इन बयालीस सालों में मेरा यहाँ भी एक परिवार बन गया है. बस चलाने वाले, बसों के सहायक, मकैनिक, सबका दिन मेरी चाय से ही शुरू होता है. सबका सफ़र मेरी चाय से शुरू होता है, मेरी ही चाय से समाप्त. मेरे हर दुःख सुख में ये मेरे साथ खड़े होते हैं और मैं भी कोशिश करता हु कि जरुरत पड़े तो मैं वहां रहूँ.
बेटे ने अच्छी जगह से एम. बी. ए. कर लिया, वो चाहता था कि इस चाय कि दुकान को छोड़ कर कुछ नया काम शुरू किया जाए.

मैंने अपनी सारी जमा पूँजी उसे इस शर्त पर दे दी कि इस चाय की दुकान को नहीं छोडूंगा. कैसे छोड़ देता. इस  दुकान का  हटना मेरे लिए वैसा ही होता जैसे शरीर के किसी हिस्से का हटना. मैंने कह दिया कि जब तक जान है यह दुकान मेरे लिया छोड़ना संभव नही. अब मेरे लिए पैसा मायने नहीं रखता - लोग मुझे मेरी चाय से जानते हैं मेरे लिए इतना ही बहुत है. मेरे साथी से उनकी यह बात होती रही. बस में चल रही उस तमिल फिल्म कि तरह यहाँ भी मुझे एक भी शब्द समझ में नही आया था. मैं केवल उन दोनों के हाव भाव समझने की कोशिश करता रहा. 
मैं चाय वाले की कोरें गीली होते हुए देख रहा था.

मैं तीन चाय पी चुका था. शाम घिरने लगी थी.  हम वापस चल पड़े. रस्ते में मेरे साथी ने मुझसे यह सब बताया. हमारी चाल धीमी थी. किवाड़ों की चौखटों पर छोटी लड़कियां दीये रख रही थी. पर मेरी आँखे अभी भी चाय वाले की बातो, भावनाओ, समर्पण, अपनेपन और निष्ठां की रौशनी से चुन्धियाँ रहीं थी. मैं चाय वाले के मन की पवित्रता को प्रकृति की सुन्दरता को होड़ देते साफ साफ देख रहा था. सालों की परतें उठ रही हैं पर वो चाय वाला अभी भी मन तहों में कहीं जीवित  है उसी पवित्रता के साथ. 




Wednesday, April 4, 2012

चौपाल का नीम..

स्कूल में पढ़ते समय फनीश्वरनाथ रेणु की एक कहानी पढ़ी थी. "कर्मनाशा की हार". आज वो कहानी मेरे सामने शब्दशःशब्द फैली पड़ी थी. मैं सामने फैले हुए गंगा के उस विशाल पाट के सामने खड़ा था. सूरज ढलान की पगडण्डी पर धीरे धीरे सरक रहा था. अगस्त का महीना. बदल अभी भी आसमान में सूरज से लुका छिपी खेल रहे थे. धूप आ जा रही थी. 
आज सुबह सुबह मैंने एक स्कूल में बच्चो के साथ स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया था. बच्चों के साथ वक़्त बिताया था. आजादी के बाद देश की प्रगति की बातें बच्चों को बताई थी.
  
उसके बाद  मुझे जैसे ही ये बात  पता चली कि इस बार बरसात में गंगा ने कई गाँव बहा दिए हैं. और कटाव अभी भी जारी है. मुझसे रुका नहीं गया.  मैं दो दोस्तों के साथ चल पड़ा था. बादल कभी भी मुंह फाड़कर बरस सकते थे. हमने गाड़ी नदी के पाट से थोड़ी दूर पहले ही रोक ली थी.  गाँव तक जाने वाली सड़क लगभग टूट चुकी थी. जहाँ थोड़ी बहुत ठीक थी वहां पानी भरा था. मुझे पूर्वोत्तर भारत के बरसाती घाटों की याद आ गई.  जो खेत बचे थे वे गहरे हरे थे. लहलहाते हुए खुश भी दिख रहे थे मानो खुश रहना ही उनकी नियति हो.

रास्ते में घर वीरान पड़े थे. बिलकुल खाली. मिट्टी के बने कुछ मकान ढहे पड़े थे. कुछ घरों को प्लास्टिक से ढका गया था. रास्तों पर लोग थे पर घरों में नही. नीम का एक पेड़ निमौरियों से भरा पड़ा था. नीम के नीचे एक चबूतरा. गाँव की चौपाल रही होगी शायद.  उसके पीछे छप्पर में खूँटी पर एक पुरानी ढोलक टंगी थी. चबूतरा आज सूखे पत्तों (जो बारिश में गीले हो गए थे) और निमौरियों से भरा पड़ा था. एक साथी ने बताया कि इस सड़क पर पांच गाँव हुआ करते थे. अब एक ही बचा है . वो अभी आधा बह चुका है.


एक फर्लांग चलने पर नदी का पाट आ गया. कुछ गाँव वाले भी आ गए. हाथ में कैमरा देखकर शायद उन्हें हमारे सरकारी मुलाजिम होने का भ्रम हुआ होगा. उनकी आँखों की चमक देखकर पता चलता था कि उनकी उम्मीद के सिरे कहाँ बंधे थे. भीड़ बढ़ने लगी. मैं लोगों के चेहरों को पढने की कोशिश कर रहा था. बेबसी की लकीरें सबके चेहरों पर साफ चमक रही थी. कुछ औरतें घूंघट निकाले पीछे कड़ी आपस में फुसफुसा रही थी.
तभी हमसे कुछ दूरी पर जोर कि छपाक कि आवाज आई. मिट्टी का एक बड़ा टुकड़ा टूटकर गंगा में जा गिरा. उस पर खड़ी एक झोपडी भी. किसी का कोई सपना टूटा हो जैसे और पल भर में गायब. पीछे से किसी के सिसकने कि आवाज आई. कोई औरत थी. सब लोग पीछे खिसक गए.
मैं दूर निकल जाना चाहता था. मेरे दोस्त गाँव वालों से बात कर रहे थे. मैं नदी के पाट के साथ साथ थोडा आगे तक निकल आया. पहली बात शांत और सौम्य गंगा का ऐसा रूप देखा था. पटारें किनारों से सर पटक रही थी, मानों सब कुछ निगल जाना चाहती हो.
मेरे भीतर भी एक तूफ़ान सिर पटक रहा था.  लाखों करोड़ों को तारने वाली गंगा ये किस रूप में मेरे सामने थी? मैंने चारों ओर देखा, खामोश बादलों के सिवा कोई नही था जो मेरे सवालों का जवाब दे सके. अभी तक उफन रही गंगा भी मानों मेरे इस सवाल पर पल भर के लिए खामोश हो गयी. मैं थोडा और आगे जाना चाहता था.

गाँव के  दायीं तरफ एक अधकच्चा मकान खड़ा था. गंगा के किनारे से कोई सौ मीटर दूर. बाहर दो बुजुर्गों को बैठा देखकर मैं उस तरफ मुड गया. घर के बाहर का हिस्सा लगभग ढह चुका  था. बूढी औरत घुटनों में सर डाले बैठी थी. चेहरा नहीं दिख रहा था. बूढ़े का चेहरा झुर्रियों से भरा था. मेहनत का पका हुआ पक्का सा रंग. दोनों हाथों में चिलम पकडे उसे पीने में मशगूल था. मैंने हाथ जोड़ दिए. कोई प्रति उत्तर नही. मन उनसे बात करना चाहता था. पर मैं बहुत रिक्त खड़ा था. बात करूँ भी तो क्या?
कुछ देर बाद मैंने पुछा - बाबा! गाँव में कितने परिवार थे? घर खाली पड़े हैं. कहाँ गए हैं सब लोग? बुढिया ने मुंह उठाकर मुझे ऐसे देखा - जैसे मैं किसी दूसरे लोक से आया था. उसके चेहरा बहुत थका हुआ था. बूढ़े ने बुढिया को कहा - जा अंदर से आसन उठा ला. बुढिया उठने का उपक्रम करने लगी - मैं उस से पहले ही जमीन पर बैठ चुका था. फिर जो कहानी मैंने सुनी - मेरे सामने "कर्मनाशा" फिर से जिन्दा उठ खड़ी थी.

गाँव में उन्हें सब फुल्लू वैद्य के नाम से जानते थे. पहले दादा और फिर पिताजी ने जड़ी बूटियों से इलाज की विद्या सिखाई थी. ज़िन्दगी भर लोगों से बिना कीमत मांगे इलाज करते रहे. जो श्रद्धा से जितना दे जाते - उतना रख लेते. घर में आठ बीघा ज़मीन थी. दो बेटियों का ब्याह कर दिया. बेटे को बारहवीं तक पढाया. घर का खर्चा आराम से चल जाता था. ज़िन्दगी में पैसे से ज्यादा मान मिला. इसी गंगा के किनारों पर मैंने हजारों बूटियाँ ढूंढी. हजारों लोगों को मौत के मुंह से खींच लाया. ये चमनी(अपनी पत्नी की ओर इशारा कर के बोले) चाहती है कि घर बार छोड़ कर हम भी कहीं ओर चले जाएँ. सुना है बाद में सरकार कभी मकान बनवाकर देगी. इतना कहकर उन्होंने चिलम दीवार से टिकाकर रख दी. 

बुढिया माँ ने मेरे हाथ पर हाथ रखा - लल्ला तू ही बता सामने मौत खड़ी है. किस पल ये गंगा हमें लील जाये कोई नही पता. बच्चे भी समझा समझा कर हार गए, वे चले गए हैं पास के गाँव में. और ये हैं कि यहाँ से हिलने का नाम ही नहीं ले रहे. गाँव वाले समझा समझा कर हार गए. ये अपनी जिद पर अड़े हैं खेत और जानवर सब गंगा मई कि भेंट चढ़ गए कुछ नही बचा, मौका है तो खुद को तो बचा लें.  तू ही बता मैं कैसे इन्हें छोड़कर चली जाऊं. 

वैद्य जी ने फिर से चिलम उठा ली. "मौत से आगे तो कुछ नही है न चमनी" जिस गंगा ने जीवन दिया, जीना सिखाया, जहाँ मैंने पानी में पैर पसारने सीखे. अगर वो मौत मांग रही है तो मैं उसे रीते हाथ जाने दू. इस मिट्टी को छोड़कर जाना चाहूं तो भी नहीं जा पाउँगा. तूने सारी उम्र साथ निभाया है, अगर तुझे अपने बच्चों के पास जाना है तू जा - मैं नही रोकूंगा तुझे. पर मुझे जाने को ना कह.

बुढिया माँ ने मुंह फेर लिया. "ज़िन्दगी भर अपनी मनमर्जी चलाई है, अब भी मेरी क्यों सुनोगे" मैं भी कहीं नही जाने वाली. बुढिया माँ ने आँचल में मुंह छुपा लिया और तेजी से उठकर भीतर चली गयी. 

मैं चुप था, और कर भी क्या सकता था. चुपचाप उठ खड़ा हुआ.सामने गंगा बह रही थी. उसके भीतर का प्रवाह मानो मेरे भीतर से गुजर रहा था जाने किस दिशा कि ओर. ये मिट्टी से कौन सा रिश्ता है जो मानवीय रिश्तों से ऊपर है.  ये कौन सी धरती है जहाँ जीवन का कोई मूल्य नही ओर मौत संतुष्टि के आगे कुछ भी नही. मैं उलटे पैर लौट पड़ा वहां रुकने कि हिम्मत जो नही थी. मैं सोच रह था कि मैं वैद्य जी जैसा निर्णय ले पाता? क्या जीवन के प्रति इतनी निरामयता और अपनी मिट्टी के प्रति इतनी निष्ठां हम तथाकथित शिक्षितों में है? सोचते सोचते मैं गाँव से बाहर निकल आया था. दोस्त पहले ही पहुँच चुके थे. पीछे मुड़कर देखा तो चौपाल का नीम चुपचाप खड़ा था. फिर से हलकी सी छपाक कि आवाज आई. मैं भीतर तक कांप गया. कहीं कोई और घर...................





Tuesday, April 3, 2012

"फरहद"


तीन साल पहले मेरे पास शादी का एक कार्ड आया था. कश्मीर से. मेरी कोई रिश्तेदारी भी नही थी. दो  बार ही जाना हुआ था वहां. मैं किसी सबीना को नही जानता था.(कार्ड पर यही नाम लिखा था.) कार्ड खोलकर देखा, दिमाग पर जोर डाला तो कार्ड में लिखा एक नाम "फरहद" पर आँखें अटक गयी. एक पूरा मंजर मेरी आँखों के सामने घूम गया.  


मैंने बहुत देर तक इंतजार करने के बाद आखिर एक ट्रक को हाथ दे ही दिया.. उस सड़क पर किसी और के रूकने की उम्मीद अब खत्म हो चुकी थी. लगभग एक घंटा मुझे वहां हाई वे पर खड़े खड़े हो चुका था. पर ट्रक भी नहीं रुका. कई बार आपकी अपनी आशाओं और अपेक्षाओं को टूटते हुए देखकर भी आपको दुःख नहीं होता. खीझ नहीं होती. बस एक समता के साथ आप उसे स्वीकार करते हैं. यही हो रहा था. मैं पूरी सात्विकता के साथ उस क्षण को जी रहा था. 

यात्रा एक ऐसे पड़ाव पर थी. जहाँ केवल स्थितियों के अनुसार आप चल सकते थे. उन पर नियंत्रण संभव कहाँ था. मैं अपने ही विचारों की ज़मीन पर खड़ा था. पीछे से आ रही आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी.
 एक ट्रक मेरे ठीक पीछे था मैंने हाथ दिया.ट्रक की रफ़्तार कम हुई और मेरी तेज़. लेकिन कोई फायदा नहीं. ट्रक की रफ़्तार फिर से तेज़ हो गयी और मेरी कम. मैं सिर्फ मुस्कुरा सका. थोड़े और इंतजार के बाद मैंने धीरे धीरे चलना शुरू कर दिया था की अपने ही बूते पर थोडा फासला तय कर सकूं.  मैंने चलना शुरू ही किया था कि पीछे से एक और ट्रक आता दिखाई पड़ा. इस बार मैं हिम्मत करके सड़क के लगभग बीच में आ गया था. फिर हाथ दिया. ट्रक मुझसे पहले ही रुक गया था. मैंने  खिड़की के पास जाकर कहा "जम्मू". ड्राइवर ने खिड़की से सर बहार निकल कर कहा - आ जाओ
मैंने कोई देरी नही की.
 दूसरी तरफ से घूमकर फुर्ती से ट्रक के अंदर. मुझे हमेशा ही ट्रक वालो की एक आदत अच्छी लगती है कि ट्रक को एकदम सजा धजा कर रखते हैं. सामने २ कठपुतलियां तंगी थी. २ पोस्टर्स चिपके थे. सामने के शीशे के तीन तरफ हरी पत्तियों वाली  प्लास्टिक कि बेल लगी थी. मैंने अपना बैग अपनी गोद में रख लिया. पहली बार ड्राइवर को देखा - २३ - २४ साल का नया लड़का. गोरा और थोडा सा पहाड़ी सा दिखने वाला. बोला - मैं रस्ते में खड़ी सवारी को कभी मना नही करता बैठने के लिए. मेरे अब्बा कहा करते थे कि मुसाफिरों को उनकी मंजिल तक पहुचने से बहुत पुण्य मिलता है. (इस से यह तो पता चल गया कि अब्बा अब नही थे)
उसने ये बाते बड़े ही सूफियाना अंदाज़ में की थी. मैंने एक बार फिर से ट्रक का सरसरी निगाह से जायजा लिया.
ड्राइवर की सीट के पीछे सोने के लिए जगह थी. जिस पर कोई सोया हुआ था. मैंने पीछे मुड़कर उसे गौर से देखा- तो ड्राइवर ने कहा की "मुनीर है - मेरा साथी - मेरा हमसफ़र".
हमने लगभग १५ किलोमीटर का सफ़र तय किया होगा. ड्राइवर ने सड़क के किनारे लगाकर ट्रक रोक दिया. अपने साथी को उठाया. नीचे कूदा. जोर से बोला आप भी नीचे आ जाओ जरा रुक कर चलेंगे. मैं बाहर आ गया. हवा ठंडी थी. दूर पहाड़ों पर बर्फ अभी भी चमक रही थी. मुनीर नीचे उतर आया. बोतल के पीनी से मुंह धोया. फिर ट्रक से एक चटाई निकल कर बाहर बिछा दी.
मैं चटाई पर जा बैठा. थोड़ी देर में ड्राइवर भी. जोर से बोला - "मुनीर खिचड़ी बना ले " - आप खिचड़ी खाओगे? दोनों ही बाते मेरे लिए अटपटी थी. ट्रक वालों को ढाबों पर खाते देखा था. लेकिन खाना बनाने की बात??????
 वो मेरे चेहरे को देखकर समझ गया शायद. "हम अपना खाना खुद बनाते हैं.  मुनीर के हाथों में जो स्वाद है उसकी बात ही कुछ और है"
मैंने खाने के लिए हामी भर दी.
नाम फरहद. श्रीनगर के पास एक छोटे से गाँव में घर. पिताजी छः साल पहले ट्रक की एक दुर्घटना में नही रहे. माँ के लाख मरने के बाद भी सत्रह साल की उम्र में ट्रक चलाना शुरू कर दिया. बारहवीं के बाद पढाई छोड़ दी. हालाँकि मन बहुत था पढने का.  पर घर का इकलौता लड़का. घर के लिए कमाएगा नहीं तो लोग क्या कहेंगे.
फ़ौज में जाने के मन था. बचपन से बंदूके बहुत पसंद थी. लेकिन घाटी में इतनी बंदूके देखीं की अब तो .............
मैंने अपना सपना बदल लिया है. लों लेकर ये अपना ट्रक खरीदा है. पहले फ़ौज में जाने का  सपना था अब एक ही सपना है कि अपनी दोनों छोटी बहनों का ब्याह अच्छे घर में करून. . जो काम अब्बा नही कर पाए उन्हें मैं करूंगा. मैं उसकी पाक आँखों को देख रहा था. जो गीली जरूर हओ गयी थी लेकिन बरसी नहीं. मैं ज्यादा देर तक उसकी आँखों को नही देख पाया. कितना मुश्किल होता होगा. मन के करीब के किसी सपने को मारना और अपने ही हाथों दफ़न कर देना.
मुनीर ने ट्रक से स्टोव उतरा. फिर एक एक करके बर्तन और बहुत कुछ. खिचड़ी बनी. साथ में कोई नई किस्म का अचार और एक मीठी चटनी भी. (फरहद ने बताया की सब कुछ उसकी छोटी बहन सबीना ने बनाया था.) गलत नही कहा था फरहद ने - "मुनीर के हाथों की बात ही कुछ और है" यह खिचड़ी किसी भी होटल  और ढाबे से कहीं ज्यादा अच्छी और बेहतर. उसके बाद मुनीर पहाड़ी गाने सुनाता रहा. और फिर बांसुरी पर पहाड़ी धुनें. मुनीर बिलकुल किसी फिल्म के सहायक अभिनेता की तरह था. जिसके बिना बहुत कुछ अधूरा रह जाता. आकाश में हलके धुंधले बदल उठ खड़े हुए थे.  हम तीनो लगभग २ घंटे बाहर बैठे रहे. अब मुझे जम्मू पहुँचने की जल्दी नही थी.
उस दिन मुझे लगा की कोई भी सफ़र मंजिल से ज्यादा खूबसूरत कैसे हो सकता है...
शादी का वो कार्ड आज भी फरहद के सपने के पूरा होने का सबसे बड़ा गवाह है..........................................

Friday, July 15, 2011

अभावों वाले भाव

इस बात को चार साल गुजर गए.
अरे!!
सिर्फ वक़्त गुजरा है. 
मंजर तो अभी भी मन की तहों में कहीं बिखरे पड़े हैं. 
जरा सहेज लूं, चुन लूं, बुन लूं, 
पर कोई कहानी या कोई फलसफा बन गया तो फिर क्या होगा?
चलो एक और कहानी सही.

एक पहाड़ उतरा और फिर एक चढ़ा. 
फिर उस पहाड़ की उतराई में हमें रोक लिया गया. दो बन्दूक वालों ने. 
हमारी नागालैंड की ही साथी टीना ने उन से बात की. 
हमें रास्ता मिल गया.
मैंने पीछे मुड़कर उस जगह को देखना चाह जहाँ हमने हमारी गाड़ी छोड़ी थी.
पीछे कुछ नहीं था.
था तो बस पेड़ों से ढके हुए पहाड़.
ये उतराई गहरी है. 
मन की गहराइयों जैसी.
उतरना मुश्किल है. नियंत्रण नहीं रखा तो फिसलोगे.

अरे! नदी की आवाज. 
टीना बताती है -  हम बराक पर आ गए हैं. नागालैंड की सबसे बड़ी नदी. 
खूबसूरत घाटी और उसमे बहती हुई बराक. 


एक बड़े पत्थर पर बैठकर बस बराक को देखते रहे. प्रकृति की झोली में कितना कुछ बिखरा पड़ा है. 
काश एक मंजर भी मेरी आँखों में आ बसता, हमेशा हमेशा के लिए. 
सूरज सर पे है. 
मुलायम धूप खरगोश के बच्चे की तरह नर्म. यहाँ वहां फुदकती है.  बराक से खेलती है.


यह वही पूर्वोत्तर है जहाँ के बारे में सुनने को मिलता है तो बस आतंकवाद, गरीबी, विद्रोह, हड़तालें, बंद. पर और कोई कुछ देखने यहाँ आता ही कहाँ है, यहाँ तो देखने को इतना सब है. कोई चाहे तो. इन दृश्यों के मुखरित होने में क्या परेशानी है लोगों को.
किसकी नजर लगी है?

हम चल दिए. पुल नहीं था. ऐसे ही नदी पार की. कमर तक पानी है. अच्छा हुआ बरसात में नहीं आये. 
पर उनका क्या जो उस पार रहते हैं. 
मैंने  टीना से पूछा - इनजाउना (जिस गाँव में हमें जाना था) के लोग इधर कैसे आते हैं. जब आना होता है. न सड़क, न पुल,?
इधर आने की जरूरत क्या है? उस पार उनकी अपनी दुनिया है. इधर नहीं आते वो लोग. इधर की दुनिया में ऐसा क्या है? उधर जाकर जो सुकून मिलता है ना वो यहाँ नहीं है.
चढ़ाई कठिन है क्योंकि रास्ता दीखता नहीं है. बस चलते रहो.
हम करीब २ घंटे चढ़ते रहे थे. राजधानी कोहिमा से चले १६ घंटे हो गए थे. थके भी थे. चढ़ाई मुश्किल हो रही थी. 
एक जगह थोडा खुली सी जगह थी. 
वहां पांच बच्चे मिले. १० -१२ साल के होंगे. 
हाथ में पानी के २ बर्तन, एक थैले में छोटे छोटे केले. पहाड़ी केले थे. बहुत मीठे. 
बच्चे हमें लेने आये थे. इनजाउना में रहकर बच्चों को पढ़ने वाली एक कार्यकर्ता लीला ने बच्चों को हमें लेन के लिए भेजा था.
एक भी बच्चा हमारी भाषा नहीं जानता था. यहाँ तक की नागामिस भी नहीं. बच्चे नंगे पांव थे. चलने में बहुत तेज. हंसने में भी. 
हम पहाड़ की चोटी पर पहुँचते हैं. सामने सपाट गाँव.
कोई तीस पैंतीस घर. बीच में एक खुला मैदान और एक कुआ. एक बड़ा सा मकान. दो मंजिला लकड़ी से बना हुआ. पूरे  गाँव में बस यही  मकान लकड़ी का है बाकि सब घास और लकड़ी से बने हुए. एक अजीब सी शांति है गाँव में. बहुत शांत. कुछ बच्चे इकठ्ठे हो गए. 
लीला हमें लेने गाँव के बाहर आ गयी थी. शांत और बहुत धीमे बोलने वाली.
उसने बताया की यह दोमंजिला मकान गाँव का समुदायक भवन है. हस्त शिल्प का बेहतरीन  नमूना. गाँव के लोगों ने श्रमदान से बनाया है.  
हम लीला के घर पहुचे. 
केवल बूढी माँ.
पिताजी नहीं है. भाई था, अब नहीं है . बरसात के मौसम में बीमारी आई थी. गाँव के कई  लोगो की जान  लेकर ही गयी. पिताजी और भाई........अब हम दोनों ही रहते  हैं. 
माँ खेतों में काम करती है और मैं गाँव के बच्चों को पढ़ाती  हूँ. पिताजी थे तो मुझे होस्टल में रखा था. कभी कभी  टेनिग (सबसे पास का क़स्बा जहाँ पहुचने में ८ घंटे पैदल  चलना पड़ता  है ) जाती हूँ कि सरकार की तरफ से कोई ध्यान इधर भी आ जाये. 
पिछले  तीन  साल से इस  कोशिश  में लगी  हूँ. गाँव में और कोई पढ़ा लिखा नहीं है. सब महिलाये खेतों पर जाती है. और पुरुष जाते हैं  शिकार पर. 
शाम को मैंने बच्चों के साथ उनकी बैम्बू से बनी गेंद का खेल खेला था. एक दम नया था मेरे लिए. वो बात अलग थी की मेरा एक भी निशाना ठीक नहीं था. और उन छोटे छोटे बच्चों का बहुत सटीक. पर ये मेरे खेले हुए आज तक के सब खेलों में सबसे उम्दा था. 
फिर हम घर के बाहर बैठे थे. मैं गाँव से बाहर जाना चाहता था. लीला ने मना कर दिया. बाहर मत जाना सूरज डूबते ही गाँव अँधेरे के आगोश में होगा. यहाँ बिजली नहीं है यह याद रखना. 
फिर भी मैं  गाँव के उस छोर तक चला आया हूँ जहाँ से सूरज  डूबता दिख रहा है. सामने हरी  घाटी  का अनंत विस्तार  है. उपर से आखिरी किरणों कि चादर. मैं खड़ा होकर सूरज का डूबना देखता रहा. 
ये सूरज बिलकुल वैसा ही है जैसे मेरे शहर में डूबता है. बल्कि उस से ज्यादा खूबसूरत.  
सूरज को तो डूबना ही था. मेरे सोचने का क्या?
मैं  वापस मुदा. 
दूसरी तरफ से चाँद निकला था. पूर्णिमा थी शायद. 
लीला के घर शाम को पूरा गाँव जमा था. सब अपनी और से हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ कर रहे थे. रात को खाना. (एक सब्जी, कोई चटनी और मोटे वाले लाल चावल)
यह स्वाद आज तक क्यों नहीं आया था खाने में. 
बूढी माँ का स्नेह हमारे सामने उन पत्तो की थालियों में सिमटा था. 
या पूरे गाँव का निश्चल प्रेम ?
गाँव भर पर चांदनी छाई  थी. रौशनी के लिए एक्के दुक्के घरों के सामने हरा बैम्बू जल रहा था. 
लीला से घर के सामने वो भी नहीं.
चाँद कुछ ज्यादा नहीं निखर हुआ है आज? मैंने अपने एक साथी से पूछा.
उसने कहा तारे भी. 
सच !!
मेरे शहर से इतने तारे नहीं दीखते. ना इतने पास ना इतने साफ़. मैं थोडा और उचकूं तो छु लूं उन्हें. 
यहाँ कोई गाड़ी का शोर नहीं. यहाँ बिजली की जगमगाहट नहीं, यहाँ लाउडस्पीकर का कानफाडू संगीत नहीं. 
फिर ऐसा क्या है यहाँ की मन बस ऐसा ही बने रहना चाहता है. हर पल जीने की उम्मीद और बढती है.
क्यों? 
सूरज वही है चाँद वही है, तारे भी वही हैं, हवा भी वैसी ही है, पानी भी - फिर इनके ही हिस्से में आभाव क्यों है? 
मेरे पास कोई जवाब नहीं. शायद किसी के पास नहीं. 
रात गहराने लगी. चाँद और निखरा. ठण्ड बढ़ गयी. नीचे से बराक की आवाज भी अब सुनी जा सकती थी. माँ एक गरम शाल मुझे देने आई. मैंने उन्हें वहीँ बैठा लिया अपने पास. बहुत देर तक वो मेरे साथ बैठी रही. बिलकुल चुप चाप. आँखों से कुछ कुछ बोलती सी. (अगले दिन माँ ने मुझे वो शाल मुझे साथ रखने को दे दी. लीला ने बताया की माँ ने कभी अपने हाथ से बनाई थी.)
उस रात जितना ही सोया जम कर सोया. सुबह बिना दूध वाली नमकीन चाय पी. सुबह सुबह माँ के साथ गाँव के एक मात्र मंदिर (सूर्य मंदिर) भी गया. 
गाँव के बच्चों को टीना की मदद से कहानियां भी सुने और उनकी सुनी भी.
फिर विदाई ली. 
गाँव वालों से, माँ से, बच्चों से,
बिना कुछ बोले. नाम आँखों के साथ. 
माँ ने पत्तों में लिपटा बंधा हुआ कुछ और भी दिया. लीला ने बताया की रास्ते के लिए खाना है. 
मैंने माँ को गले से लगाया. कैसे उरिण होऊंगा, कैसे संभल पाउँगा स्नेह का यह बोझा..?
वापसी में हम फिर से बराक के किनारे उसी पत्थर पर बैठे. मैं आँखें बंद किये घंटे भर वहां लेता रहा कि पता नही फिर बराक मिले या ना मिले. बराक के पानी में घुलती ये बांस के फूलों की खुशबू नसीब में हो या ना हो...
मैं विकास और अभ्वों की बात सोचता रहा.  पर विकास और अभावों कि इस प्रतियोगिता में आज तो अभावों वाले भावों ने बाजी मारी थी. 
मैं खुश था. 
लीला हमारे  साथ ही नीचे आई थी. आई. 
उसे फिर से किसी सरकारी ऑफिस में जाना था. वो महीने में दो बार जाती है. इस आस के साथ कि इस बार शायद कोई उसकी पुकार सुन ले. नहीं सुनता. फिर भी वो जाती है. 
और हाँ!!

उस शाल की गर्माहट आज भी उतनी है. जितनी उस रात थी मेरे लिए. 


Monday, July 11, 2011


यात्रायें आपको अनुभव देतीं हैं. यही सुना था. यात्रायें संवेदनाएं जगाती हैं यह अनुभव हुआ था. आज तक दुनिया के जितने रंग देखे -  यात्राओं में देखे. सपनो की उड़ान भी और परवाज़ की सिमटन भी, जिंदगी के गहरे रंग भी और अनजान ठोकरों  सब यात्राओं में मिला था.
बारहलाछा दर्रा पार करके हम बस यूँ ही चले आये थे यहाँ तक. कल्पना से परे मैं एक परीलोक में घूम रहा था.  मानों वे गहरी घाटियाँ मेरे भीतर उतर रही थी. नदी मेरे भीतर एक नया मोड़ ले रही थी. मैं बादलों के बीच में अटका खड़ा था. बारिश की हलकी हलकी बूँदें मुझ से कितनी ही देर बेपरवाह टकराती रही थी.
 मेरे साथी ने कन्धा हिलाकर कहा - चलो वापस किलोंग पहुंचना है.  मैं गाड़ी में जा बैठा. निगाहें खिड़की के बाहर उन पहाड़ों में मानो कुछ खो गया था मेरा.  
वापसी में चार घंटे लग गए. सिर दर्द बढ़ता ही जा रहा था. मैं होटल पहुंचा तो सीधे बिस्तर पर. सोने की कोशिश पर नाकाम. मैं उठकर होटल के रिसेप्शन पर गया. डॉ. के बारे में पूछा तो पता चला की वहां कोई डॉ. नहीं है. केवल एक सिविल हॉस्पिटल है वहां शायद डॉ. मिल जाये. मैं  पैदल ही चल पड़ा. इस क़स्बे के बिलकुल दूसरे कोने पर सिविल हॉस्पिटल. वहां पहुंचा डॉ. मिल गए. एक स्पेशल केस देखने के लिए वो आये हुए थे. मैंने दवाई ली. वापस.
होटल जाने का मन नहीं था. मैं दूसरी तरफ चल दिया. शाम हो रही थी. ठंडी हवा. जिस्पा नदी की डराने वाली आवाज. 
घाटी हरे रंग से पुती थी. पहाड़ों के चोटियों से बादल खेल रहे थे. 
कोई भी ऐसे में थोड़ी देर बैठना चाहेगा. ये वो शांति थी जो हमेशा के लिए आपके भीतर जा बैठती है. आँखों के सामने जब जब भी ये दृश्य होता है मैं तब तब उस असीम शांति का अनुभव करता हूँ. 
शहर कोई २ मील पीछे छूट गया था. नदी के टकराव की आवाज और तेज हो गयी थी.
थोड़ी देर में अँधेरा गहराने लगा था. मुझे कोई एक फर्लांग दूर एक रौशनी दिखी. मैं आगे चलता गया. थोडा पास आने पर कुछ आकृतियाँ भी हिलती दिखाई दी. पर घर जैसा तो कहीं भी कुछ नहीं था. मैं पास पहुंचा, थोडा सा उपर चढ़ा, एक प्लास्टिक की पन्नी से ढका टेंट लगा था. बाहर कुछ लोग आग के पास बैठे थे. मैंने आग की रौशनी में गौर से देखा तो पता चल गया कि ये स्थानीय लोग तो नहीं हैं.

मैं साथ जा बैठा. कुछ चार लड़के थे. उम्र २० से ज्यादा किसी कि नहीं थी.
ये चारों बिहार के आरा जिले के रहने वाले थे. 
बिहार से इतनी दूर घूमने? 
मैंने गलत सवाल पूछ लिया था शायद. 
नहीं हम यहाँ सड़कें बनाते हैं. कुछ लोग सड़कें बनाते हैं, ठीक करते हैं और कुछ लोग पहाड़ गिरने का इंतजार करते हैं कि पहाड़ गिरें तो उन्हें हटाने जाएँ. 
मैं बहुत चुप चाप उन्हें देख रहा था. तभी एक अधेड़ आदमी भीतर से एक गिलास में चाय ले आये. बिना दूध की चाय.
सूरज १९, सतीश १८, रामकुमार २० और राजू २०. तीनों की ३ साल हो गए हैं. 
सतीश ने बताया की रोहतांग से कीलोंग तक की सड़क बनाते वक़्त उसके दादा और पिताजी भी सड़क बनाने वालों में  थे. एक बार पहाड़ गिरा और वो दोनों ही उस हादसे में नहीं रहे. बड़ा भाई भी यही हैं लेह के पास. सड़कें ठीक करता है. उसका गला रुंध गया था. बात अजीब सी थी, 
कहाँ बिहार और कहाँ कीलोंग. किस्मत की न जाने कौन सी सड़क उन्हें यहाँ ले आई थी.

मैं उनसे बैठा बातें करता रहा. सतीश का परिवार भी जिस्पा के पास के ग्रुप में है. राजू पिछली बरसात में बाल बाल बच गया था.

मैंने सोचा की विषय बदलने की जरूरत है शायद.
"आसपास घूमने की अच्छी जगह कौन कौन सी हैं"
वे आपस में एक दूसरे को देखने लगे.
"हमें क्या पता?" राजू बोला. उसकी आँखों में जो निरीहपन था, वो भीतर तक घुस गया था मेरे.  
हमें तो बस सड़कें ही अच्छी लगती हैं. कुछ और देखा ही नहीं अभी तक. लोग कहते हैं की आगे बहुत कुछ सुंदर है. तीन साल हो गए हैं आये हुए. हमारे पास ये २० किलोमीटर का इलाका है. हर रोज बस आप जैसों की हिफाजत के लिए यही से उगता सूरज देखते हैं और यहीं से उसे डूबते हुए. दिन भर हम बस यही रहते हैं सूरज ही आता जाता है. ऐसे ही सबके हिस्से बंटे हैं. हमें हमारे काम से मतलब है. वरना ये जो गरम चूल्हा देख रहे हैं न ये ठंडा पड़ जायेगा.जो नज़ारे और जो पहाड़ आपको खूबसूरत लगते हैं ना हम हर रोज डर डर के उनके साये में जीते हैं.

मैं उठ पड़ा. भीतर जाकर देखा. एक कमरे लायक जगह थी उसमे ७ लोग रहते हैं. यही था उनका राज महल.
 दोस्त होटल में इन्तजार कर रहे होंगे. मैं वापस मुड़ा. 
तो इन नौजवानों का एक एक शब्द मेरे साथ चहलकदमी करने लगा. जाते हुए मैं  जितना शांत था आते हुए उतना ही उथल पुथल से भरा था. इन तरुणों की हाथों की लकीरों में ऐसा क्या है की ये इतने बंधे हैं. दो जून की रोटी के आगे की दुनिया के लिए उनके रस्ते बंद हैं. क्यों?
क्या प्रकृति के मायने हम सबके लिए इतने अलग अलग हो सकते हैं. मैंने कभी सोचा ही नहीं था. दिन के चोकलेटी पहाड़, बसंती हवा. बर्फ से ढके धवल शिकार मैंने जिनके कारण देखे..मेरा मन उनके लिए एक अनजानी कृतज्ञता से भर गया. नदी अब और तेज दहाड़ने लगी थी. पर सतीश के शब्द मेरे कानों में ज्यादा शोर मचा रहे थे.   
  
       


आज मैं घन्टों उन चोकलेटी पहाड़ों  के सामने खड़ा रहा था. जिनमे जगह जगह बरफ भरी पड़ी थी. यह सब कुछ सम्मोहन से भरा था. आने से पहले नहीं सोचा था कि यात्रा का प्रतिफल इतना खूबसूरत होगा. 

Friday, July 8, 2011

और यह लड़की???



मैं बागडोगरा हवाई अड्डे से बाहर निकला, बाहर के हालत कुछ अजीब से थे. कोई बस नहीं, टैक्सी नहीं. हवाई अड्डे से सिलीगुड़ी शहर 8 किलोमीटर दूर है. पता चला कि आज "बंद" होने के कारण यहाँ कोई साधन नहीं मिलेगा. ऐसे समय में आप बहुत बंधे होते हैं जब अनजानी जगह पर कुछ भी नहीं सूझता.8 किलोमीटर की पैदल यात्रा, सामान के साथ-जिंदगी में एक और ना भूलने वाला अनुभव जुड़ गया. थोड़ी देर पहले मैं आसमान में उड़ रहा था और अब वापस उसी जमीन पर था. मुझे एक बार फिर लगा कि जमीन से जुड़े रहना ही हेमशा बेहतर होता है. शहर पूरा बंद था. किसी आबाद शहर में इतनी वीरानियत.. कहीं न कहीं ये विकास की देन है जो हमने बहुत मुस्कुराते हुए स्वीकार की है. घर बंद, दुकानों पर ताले, जैसे पंछियों ने भी कहा आज हम भी मनुष्यों का साथ देंगे. 

मुझे नहीं पता कि उनका अनुभव कैसा रहा होगा. पर मैंने ऐसा शहर कभी नहीं देखा था. जो जानबूझकर आँखें मूंदे सोया था.बा-मशक्कत एक होटल मिला. मैंने गंगटोक तक के लिए टैक्सी के लिए पूछा. "6 बजे से पहले कुछ नहीं मिलेगा आज बंद है बंद". जिस से भी पूछा सबका एक ही सीधा सपाट सा जवाब. और वैसे भी 6 बजे के बाद वहां जाने को कौन तैयार होगा, बारिश का मौसम है, इतना रिस्क कौन लेगा? इस लिए बेहतर है कि आप आज रात यहाँ रुक जाये और सुबह निकल जाएँ. मेरा किसी भी हालत में रात तक गंगटोक पहुंचना कितना जरूरी था. ये कोई नहीं जानता था. सिलिगुरी से 5 -6 घंटे लगते हैं. मैंने बहुत उपापोह की स्थिति में होटल में शाम तक रुका.
पूर्वोत्तर में ६ बजे अँधेरा हो जाता है. फिर भी मैं सामान के साथ बहार निकल गया कि मैं अपनी ओर से कोशिश कर लूं. आगे की राम जाने. होटल से दाहिनी ओर एक चौराहे पर मैं अपने सामान के साथ खड़ा था. सड़क पर आवाजाही बढ़ गयी थी. पर बहुत कम. 2 -3 टैक्सी वालों से पूछा - नहीं इस समय नहीं और फिर पहाड़ भी बरस रहा है. आपने कभी पहाड़ की बारिश नहीं देखी क्या? जो इस वक़्त जाने की पड़ी है. मैं चुपचाप खड़ा था. पहुंचना भी जरूरी था. और रास्ता कुछ नहीं. मैंने सोचा कि जब कायनात यही चाहती है तो फिर यही सही. मैंने वापस रुख पकड़ा ही था की एक मार्शल मेरे पास आकर रुकी. ड्राइवर की सीट वाली खिड़की से एक सिर बाहर निकला.कहाँ जाओगे? मैंने बिना कुछ ध्यान दिए बोल दिया - गंगटोक.
लड़की थी. लड़कों की भूषा. सिर पर टोपी. उम्र का अंदाजा नहीं लगा उस झलक में. अचानक बोली. रिस्क तो है पर मैं चलूंगी. रुक कर बोली. - ऐसा क्या जरूरी काम है. सामान पीछे रख दो और बैठ जाओ. मैं देखती हूँ कोई और सवारी मिलती है तो. मुझे तो शोले की बसंती याद आ गयी.
बक बक बक बक.   
खैर यात्रा शुरू हुई. मैं डरा हुआ था, क्योंकि पहली बार ऐसी  टैक्सी में बैठा था जिसे एक लड़की चला रही थी. सिलीगुड़ी छोड़ने के बाद बारिश तेज होने लगी, सड़क पर इक्का दुक्का वहां ही आ रहे थे. पहाड़ी क्षेत्र शुरू होते ही बारिश और तेज होती चली गयी. मैं इस बात से बिलकुल बेखबर बैठा था कि मैं अपनी जिंदगी मैंने अपनी जिंदगी के सबसे खतरनाक रस्ते से गुजरने वाला था. घुप्प अँधेरा, तेज होती बारिश. तेज रफ़्तार से भागती गाडी और लगभग अनाड़ी ड्राइवर. पिछले जन्म का कोई कर्म?
कोई सपना छितरा छितरा गया हो जैसे. सामने बिजली कड़क रही थी. गाड़ी की एक लाइट ख़राब थी. एक ओर रौशनी की कमी खल रही थी. और दूसरी ओर सामने की रौशनी मन में बस डर भर रही थी. कितनी अलग अलग भूमिका. 
मैंने डरा सिमटा बैठा था. बादल फटे पड़े थे. पहाड़ों से पानी के झरने ऐसे बह रहे थे की रेगिस्तान में बरस गए होते तो शायद वहां भी अंकुर फूटने की उम्मीद जग जाती. यही कुदरत है. उसे पता है कि किस के सामने कितने ओर कब बसना है. गाड़ी में पानी भर रहा था. सड़क पर पानी कितना था पता ही नहीं चल रहा था. 5 मीटर से ज्यादा देख पाना संभव नही था. पानी अंदर आ रहा था. नीचे से भी ओर दरवाजों से भी. एक खिड़की का पल्ला जो  नहीं था. अगर एक चीज कम नहीं हो रही थी तो वो थी  गाड़ी की रफ़्तार और बारिश की धार.

आँखें अपने आप बंद हो रही थी और होंठों पर प्रार्थना स्वयमेव आ रही थी. 
और कुछ रास्ता भी क्या था. मेरे साथ बैठे दोनों व्यक्ति बार बार मुझे देख रहे थे और मैंने  अपनी उस सारथि को. उसके हाथ स्टेयरिंग पर ऐसे फिसल रहे थे जैसे कोई बच्चा फिरकी चलता है. उसका चेहरा अभी भी उतना ही विश्वास से भरा था जितना पहली झलक में था.  मेरे लिए यह सफ़र किसी वैतरणी को पार करने से कम नहीं था. मैंने समय देखा. डेढ़ घंटा बीत चुका था. मैं अपने कई साथियों को संदेसा भेज चुका था की मेरे लिए प्रार्थना करें.
कई बार जान गले तक आ गयी थी. फिर वापस. मुझे उस रात यह एहसास हुआ की कहीं न कहीं ये क्षण हमें ईश्वर के कितने पास ला छोड़ते हैं. मैं प्रार्थना में था. बारिश और भयानक हो गयी थी. मैं कितनी देर उस प्रार्थना में था. आँख खुली तो हम एक नदी के किनारे थे एक ढाबे पर. यह तीस्ता नदी थी. सिक्किम की सबसे बड़ी नदी. बारिश कम हो गयी थी. ऐसा लगा जैसे कोई डरावना सपना अभी अभी टूटा हो और मैं उसके रहने के चिन्ह अभी तक जस के तस पड़े हों.
मैं बहुत चुप था. समझ में नहीं आ रहा था की उस लड़की का धन्यवाद दूं. या खुद से सवाल करू कि क्यों 4 जानों को मैंने मुसीबत में डाला. 
आगे रास्ता बेहतर था. वो आसाम कि रहने वाली थी. उसका नाम नीमा था. अब तक केवल गर्दन हिलाने वाली उस लड़की ने बातचीत शुरू कि. मेरा गंगटोक पहुंचना जरूरी क्यों है.  मैंने बताया तो वो समझ गयी शायद. नदी के किनारे हवा ठंडी थी. हम दोनों ही गीले कपड़ों में बहार खड़े थे.  
हम बोडो (आसाम की एक जनजाति) हैं.  एक बड़ा भाई था, जो उल्फा से जुड़ गया. और बाद में पुलिस के हाथों मारा गया. माँ - पिताजी को सदमा लगा. हमने आसाम छोड़ दिया. यहाँ मामा के पास आ गये. यह उनकी ही गाड़ी है. पिताजी कि हालत नहीं है कि कुछ करें. पेट तो पालना ही है न?
डर नहीं लगता? मैंने पूछा. यही क्यों चुना.?
नहीं. डरकर कौन जिया है आज तक. जो होगा देखा जायेगा. एक बार डरकर अपना घर आसाम छोड़ दिया. वो दर्द आज तक सालता है.
अब मेरे माँ बाप मेरी जिंदगी हैं. उनका बेटा मैं ही हूँ. 
मुस्कुराती है.
मैंने पीछे घूम कर देखा तो पिछली सीट पे बूढ़े बुढिया सोये पड़े थे. 
मैंने वापस सीट पर आ बैठा. उसने गाड़ी स्टार्ट कर ली. मैं बाहर देख रहा था. तीस्ता कितनी अविचल बह रही थी. 
और यह लड़की???